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गिद्धभोज

>> मंगलवार, 6 जुलाई 2010

भी परसों शाम को बन-ठन के निकले, आख़िर शादी में जीमने जाना था। जीमना नहीं समझे, मालवी में भोजन करने को जीमना कहते हैं। रास्ते में घांसीरामजी मिल गए। घांसीरामजी खालिस मालवी कैरेक्टर हैं। हमने पूछा किधर की तैयारी है। छूटते ही बोते, 'अरे वो फलानी जगह गिद्धभोज में जई रियो हूं।' ये सुनते ही मेरे दिमाग में मन्नू भंडारी का महाभोज चक्कर काटने लगा। हैरानी से गिद्धभोज को जरा स्पष्ट करने को कहा तो बिल्कुल अनोखी बात सामने आई। वो भी उसी शादी में जा रहे थे जहाँ मैं जा रहा था और वे भोजन की बफ़े प्रणाली को गिद्धभोज कह रहे थे। मैं तो अवाक रह गया, इस निपट देहाती ने बफ़े को कैसी अनोखी उपमा दी है।

खैर वहां पर पहुंचे तो लोग अभी आ रहे थे और जो आ गए थे वे एक दूसरे से मेल-मुलाकात कर सामाजिकता बढ़ा रहे थे। कुछ देर बाद जब भोजन शुरू हुआ तो थोड़ी देर तक तो ठीक-ठाक रहा। लेकिन जब और अधिक मेहमान आ गए तो भोजन के लिए तय जगह थोड़ी छोटी लगने लगी। लोगों में इतना धीरज नहीं था कि कुछ लोगों का भोजन हो जाने तक रुक जाएं। दृश्य ऐसा था जैसे लोग एक दूसरे के ऊपर से खाने पर टूट पड़े हों। अब मुझे ये बफ़े पार्टी वाक़ई गिद्धभोज लग रही थी। हर स्त्री-पुरुष अपनी प्लेट एक हाथ में लेकर पंडाल में उड़ रहे हैं और दूसरे हाथ में चम्मच या कांटा लेकर गुलाब-जामुन, दहीबड़ा, नूडल्स, मंचूरियन, आदि नाना प्रकार के व्यंजनों के शिकार को उदरस्थ कर रहे हैं।

मेरी दृष्टि कुछ धुंधला गई है.... हां अब ठीक नज़र आ रहा है...ओह मैं देख रहा हूं ऊपर आसमान में एक व्यक्ति उड़ रहा है। हां गिद्ध ही लग रहा है, लेकिन चेहरा तो एंडरसन का है और पंखों पर यूनियन कार्बाइड लिखा है। अरे ये क्या... नीचे पंडाल की जगह हज़ारों भोपाल निवासियों के शव दिखाई दे रहे हैं। अरे वहां तो कुछ देसी चेहरे वाले गिद्ध भी उड़ रहे हैं। ओह ये तो इंसानों को अपनी प्लेटों में डाले जा रहे हैं। अब तो पूरे आसमान में गिद्ध ही गिद्ध दिखाई दे रहे हैं। लेकिन ये तो नरभक्षी नहीं बल्कि सर्वभक्षी लग रहे हैं। लो... अभी एक गिद्ध ने एक सड़क को सांप समझकर निगल लिया है। उधर बहुत से हैं जो सड़कें खा रहे हैं, कुछ ने बांध और पुल भी खा लिए हैं। स्टेडियम भी बड़े स्वादिष्ट होते हैं, खेल संघ की चटनी के साथ तो मज़ा दोगुना हो जाता है...यमीऽऽऽ...कई बार खिलाड़ियों को और यदि महिला खिलाड़ी हो तो उनकी इज्जत को भी चख लेते हैं। आखिर गिद्ध हैं तो पेट भरना ज़रूरी है, यदि टैंक पूरे ना पड़ें तो शहीदों के कफन भी खा लेते हैं। भई लाजवाब हैं ये गिद्ध, एक समूह के हों या अलग समूह के, अक्सर मिलबाँट कर खाते हैं। भैंसों का चारा खा लेते हैं, तो गरीबों का राशन, मिट्टी का तेल वगैरह भी उदरस्थ कर लेते हैं। बाढ़, सूखा, भूकम्प आदि कई तरह की राहत राशियां इनका प्रिय व्यंजन है। विभिन्न सरकारी योजनाएं रोज़ के नाश्ते के लिए होती हैं। कुछ गिद्ध हाई प्रोफ़ाइल होते हैं जो बड़े-बड़े सौदों में कमीशन खाते हैं और कई तो देश की अस्मत और सुरक्षा भी हज़म कर जाते हैं। कुछ छुटभैये गिद्ध भी हैं जो फ़ाइलें, अर्जियाँ, पेंशन, स्कॉलरशिप और आम जनता के काग़ज को खाकर ही संतुष्ट हो लेते हैं। कई खाते नहीं हैं बल्कि काग़ज़ात दबाकर शिकार में हिस्सा बँटा लेते हैं। कुछ गिद्ध इज्जत बचाने के लिए अपनी संतान को भी मार देते हैं। ये गिद्ध चाहते हैं कि उनके बच्चों की शादी उनके धर्म और जाति में ही हो लेकिन गोत्र या गाँव में ना हो।

उनके गले में रंग बिरंगे दुपट्टे हैं, कुछ के सिर पर टोपी और कुछ के बदन पर वर्दी है। कुछ गिद्धों ने रंगीन चश्मे भी लगा रखे हैं। इन चश्मों का रंग हरा, भगवा, नीला और लाल या कुछ भी हो सकता है। आजकल सफेद चश्मा भी प्रचलन में है। ये चश्मे वाले गिद्ध बिना चश्मे वालों से ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं। जैसे लाल रंग वाले गिद्ध लोगों को अक्सर दूसरे चश्मे वाले गिद्धों से डराते हैं और फिर...सुरक्षा और आज़ादी के नाम पर खुद ही पब्लिक को हजम कर जाते हैं। ये चश्मे वाले गिद्ध कभी चश्मा हटाकर दुनिया को देखना ही नहीं चाहते।

वैसे तो गिद्धों का धर्म जाति आदि नहीं होते, फिर भी ये खुद को किसी ख़ास धर्म के लोगों का हितैषी, संरक्षक, झंडाबरदार आदि बताते हैं। ये धर्म के नाम पर भी लोगों को जीम रहे हैं। ये धार्मिक गिद्ध अपना ही राग अलापते रहते हैं और विविधता से इन्हें नफरत है। ये चाहते हैं पूरी दुनिया में बस इनके जैसे ही गिद्ध हों, दूसरे या तो खत्म हो जाएं या इनके जैसे हो जाएं।

मुझे और अधिक साफ़ दिखाई देने लगा है। पूरे देश के आसमान में गिद्ध ही गिद्ध उड़ते नज़र आ रहे हैं। वे पूरे देश को नोंच-नोंच के खा रहे हैं। पर इन छोटे-बड़े गिद्धों के भोजन चक्र में अंतिम रूप से आम जनता ही कलेवा बन रही है...लेकिन मैं देख रहा हूँ कि इस आम जनता में भी जो व्यक्ति गिद्धों को कोसता रहता है, वह भी जब मौका मिलता है तो गिद्ध बनकर अपने से कमज़ोर को शिकार बना लेता है। देश की पूरी आबादी ही गिद्ध हो गई है कुछ स्थायी और कुछ अस्थायी। सारा मुल्क मरघट में तब्दील हो गया है। सांय-सांय करता सन्नाटा मेरे कानों को चीर रहा है।

पूरे देश के आसमान में गिद्ध ही गिद्ध उड़ते नज़र आ रहे हैं। वे पूरे देश को नोंच-नोंच के खा रहे हैं। पर इन छोटे-बड़े गिद्धों के भोजन चक्र में अंतिम रूप से आम जनता ही कलेवा बन रही है...

स्तब्ध देख रहा हूँ मैं सबकुछ गिद्धों के मुंह में जाते हुए-देश का धन, संसाधन, संपदा, सड़क, रेल, पुल, बांध, जंगल, प्राणी, जनता और ठीक वैसे ही अर्जुन ने कृष्ण के विराट रूप में प्राणियों को प्रवेश करते देखा था। मुझे तत्वज्ञान प्राप्त हो गया है कि मैंने मनुष्य जन्म पाया है तो अपने कर्म करता रहूँ और गिद्ध में कनवर्ट होने का विचार भी मन में ना लाऊँ। ओह... वो मेरी ही ओर आ रहा है, लेकिन मेरा तो किसी भी दुपट्टे, टोपी, वर्दी या चश्मे वाले गिद्ध से कोई सीधा कनेक्शन नहीं रहा है। शायद उसने मेरी पोस्ट पढ़ ली है। वो मेरे सिर पर मंडरा रहा है...उसके विशाल डैनों की हवा से मेरे सिर के बचे बाल लहरा रहे हैं। आह... उसने अपने नुकीले नाखूनों वाले पंजों से मेरे दोनों कंधे जकड़ लिए हैं। वो पकड़कर झकजोर रहा है... मैं पसीने से लथपथ...चीखना चाहता हूँ...मेरी चेतना मेरा साथ छोड़ रही है...

वो आवाज़ दे रहा है...सुनो...अरे सुनोऽऽऽ...
इंद्रियाँ सजग हुईं। ओह! मेरी पत्नी मेरे दोनों कंधों को पकड़ कर झकझोर रही है।
'सुनो! आज उठना है या नहीं?'
मैं बिस्तर पर हूँ और पत्नीजी जगाने की भरसक कोशिश कर रही हैं...तो ये श्रीखंड, राजभोग, पेटिस, कुल्चे, पनीर आदि सूतने से उत्पन्न खुमारी से परिपूर्ण सपना था।

गिद्ध दृश्य पटल से चले गए हैं। मैं भी नहाकर अखबार के पन्ने पलटूँगा और काम पर चला जाऊँगा और फिर वही ज़िन्दगी की भागमभाग, वही मारामारी शुरू हो जाएगी जिसे सरल भाषा में मन को तसल्ली देने के लिए रूटीन कहते हैं। अच्छा हुआ वो सपना ही था लेकिन वो केवल सपना ही था क्या? गिद्ध भी तो अपने रूटीन पर चल पड़े होंगे।

इति गिद्धम।

अस्वीकरण: ये विचार मेरे सपने की खुराफातें हैं। इनका किसी भी ‍जीवित या मृत गिद्ध अथवा मानव से कोई संबंध नहीं है। ना ही इसमें गिद्धों का अपमान करने की कोई कोशिश की गई है। पशु-पक्षी अधिकार वाले महानुभाव अन्यथा न लें। गिद्ध आज विलुप्तप्राय प्रजाति है जो प्रकृति की सफ़ाई कर उसे संतुलि रखती है। आइए उनके संरक्षण में सहभागी बनें।

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: Satire, Vulture, व्यंग्य, गिद्ध,


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2 टिप्पणी:

सागर नाहर 12 अगस्त 2010 को 6:49 pm  

इस लेख की सबसे सुन्दर पंक्‍तियां यह लगी
..लेकिन मैं देख रहा हूँ कि इस आम जनता में भी जो व्यक्ति गिद्धों को कोसता रहता है, वह भी जब मौका मिलता है तो गिद्ध बनकर अपने से कमज़ोर को शिकार बना लेता है। देश की पूरी आबादी ही गिद्ध हो गई है कुछ स्थायी और कुछ अस्थायी।
कमाल का लेख लिखा है आपने अतुलजी। बड़ा दुख: हुआ कि इतना सुन्दर लेख मेरे ब्लॉग जगत से दूर रहने के कारण एक महीने बाद पता चला। मैने इस लेख का लिंक अपने जीमेल स्टेट्स पर भी लगाया है ताकि मेरे मित्र भी इसे पढ़ सकें।
एक बात का और भी आश्‍चर्य हुआ कि इतने बढ़िया लेख पर एक भी टिप्पणी नहीं!!

ZEAL 29 सितंबर 2010 को 8:04 am  

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गिद्ध तो निश्चित ही पर्यावरण का संतुलन बनाये रखने में हमारे मित्र हैं। लेकिन जिस प्रकार से लोग बफे-सिस्टम में टूट पड़ते हैं , वह निश्चय ही गिद्ध-भोज की याद दिलाती है। जाने कहाँ गए वो दिन जब प्रचलन में था पंक्तियों में बैठकर सुकून से भोज किया करते थे। मेज़बान भी आग्रह कर-कर के खिलाते थे । पेट के साथ आत्मा भी तृप्त हो जाती थी।

इस सुन्दर लेख के लिए आभार एवं शुभकामनायें।

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