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सुर्ख होता 'लाल' वाद

>> गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

.....उन्होंने 72 को मार दिया। तो क्या हुआ? आखि़र सरकार को इस 'हरे शिकार' की क्या ज़रूरत थी? वैसे वे लोग भी तो शिकार ही कर रहे हैं। उन आदिवासियों की गरीबी, भूख, अशिक्षा, विश्वास, निर्मल मन का शिकार ही तो कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वे इन वनपुत्रों को उनका हक़ दिलवा रहे हैं। जो हक़ गणतंत्र से नहीं मिला वो गनतंत्र से दिला रहे हैं। वनोपज, शिकार, प्राचीन खेती पर निर्भर ये लोग एक तरह से जंगलराज में ही गुजर करते हैं। शिकार करो या शिकार हो जाओ। अभी इनका शिकार माओवादी कर रहे हैं। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकारी मशीनरी ठीक से ध्यान देती तो सरकारी आदमी खाओवादी बनकर इनका शिकार करते। मतलब इनका आखेट होना तो तय था। हो सकता है जिन स्थानीय लोगों ने कभी इन विभिन्न 'वादियों' को अपना मददगार समझा हो वे आज स्वयं को असहाय और ठगा महसूस कर रहे हों। उनकी स्थिति फ़िल्मी माफ़िया के चंगुल में फँसे हीरो के जैसी हो गई है कि अपनी मर्जी से आ तो सकते हो परंतु जा नहीं सकते। बिल्कुल वन-वे ट्रैफ़िक। इतने "सालों" की सरकार विरोधी गतिविधियों, हिंसा और समांतर सरकार चलने पर भी लोगों का कोई भला हुआ होगा या उनकी दैनिक ज़रूरतें भी पूरी हो गईं होंगी, ऐसा लगता नहीं है। नक्सली प्रभावित क्षेत्र की जनता निश्चित रूप से सांप-छछूंदर की स्थिति में होगी। इस लाल आंदोलन को चलाने वालों में अब वैसे ही तत्वों की घुसपैठ हो गई है जैसे शहरों में हफ्ता वसूली, रंगदारी आदि करने वाले एक तय इलाके में समांतर सरकार नहीं तो भी खौफ की चक्की तो चलाते ही हैं जिनमें शहरी आम आदमी पिसता है। आंदोलन के प्रणेता कानू सान्याल ने इस भटकाव को देखकर आत्महत्या कर ली। जब नक्सलवाद जन्मा होगा तो संभवत: उसके लक्ष्य उचित रहे होंगे क्योंकि ये आंदोलन प्रशासनिक कुप्रबंधन के खिलाफ था, परंतु लक्ष्य प्राप्ति के तरीक़ों के बारे में पूरी तरह से ऐसा नहीं कहा जा सकता। नक्सलबाड़ी से चली यह धारा समय, परिस्थिति, स्थान के कारण अपना प्रवाह बदलती गई और सब जगहों की गंदगी भी अपने साथ समेटती गई। समय के साथ उलझने भी बढ़ती गईं। जब साधन ही ग़लत हो गए तो दिशाहीनता की स्थिति आनी ही थी।

आंदोलन अधिकतर वहाँ फैला जहाँ भूखे-अशिक्षित लोग थे क्योंकि उन्हें बरगलाना आसान है। विकसित, शिक्षित, रोजगार में लगी आबादी में इनकी पैठ संभव नहीं है। उन लोगों का भी इसमें योगदान है जो शिक्षित हैं पर उनके पास काम नहीं हैं या फिर काम करना नहीं चाहते हैं, या फिर वे लोग जो शिक्षित तो बहुत अधिक हैं लेकिन उनकी सोच, उनकी दृष्टि पर एक विचारधारा का चश्मा चढ़ा है। जब अंकुर फूटा था तब ही इस खरपतवार को पहचानकर उखाड़ फेंकना था। पर कुछ लोगों ने इसे खाद पानी देना शुरू किया, आज भी दे रहे हैं। नतीजा सबके सामने है। देश में जहाँ प्राकृतिक और खनिज संपदा है वहीं पर इसकी लाल जड़ें फैल गई हैं। वर्तमान में भी इनके नेता या संगठन प्रमुख की गिरफ़्तारी पर कुछ त‍थाकथित लोकतंत्र बचाऊ संगठनों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के बयान आए हैं कि दंतेवाड़ा का ये नक्सली हमला ऑपरेशन ग्रीन हंट का दुष्परिणाम है। सुरक्षाबलों पर आरोप लग रहे हैं कि वे गाँवों में घुसकर निर्दोष आदिवासियों से मारपीट करते हैं। ठीक ऐसा ही हम काश्मीर मामलों में भी सुनते आ रहे हैं। इन्हें आतंकवादी नहीं कहा जाता तो बस इसलिए कि ये इसी देश के नागरिक हैं? वरना इनमें और बाहर से आकर आतंक फैलाने वालों में क्या अंतर है? दंतेवाड़ा में सशस्त्र सुरक्षा बल की बख्तरबंद सुरंगरोधी वाहन को उड़ा देने वाले हथियार इन्हें पास-पड़ौस से या दूर-दराज से ही मिले होंगे, जहाँ इन्हें प्रशिक्षण भी मिला होगा। सात राज्यों में लगभग 150 जिलों में नक्सलवादी हिंसा की आग फैल चुकी है और निश्चित रूप से बाहरी शत्रु इसे हवा देकर देश को अस्थिर करने का मंसूबा पाले बैठे होंगे। यदि ऐसा ही चलता रहा तो उत्तर-पूर्व, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और दक्षिण के राज्यों में लाल गलियारा बन जाएगा जो नेपाल होते हुए सीधे चीन की ओर जाएगा।

यह बात भले ही सत्य हो कि कानू सान्याल ने वंचितों के लिए इस विचारधारा को जन्म दिया, परंतु संभवत: भारतीयता के अभाव की वजह से लोहिया और जेपी के आंदोलन के जैसा देशव्यापी समर्थन और सफलता नहीं मिली। आज भी देश के विभिन्न भागों में, जहाँ नक्सल या माओ समस्या नहीं है, सामाजिक विषमताएं अवश्य हैं, सरकारी योजनाएँ, परियोजनाएँ व अन्य सामाजिक सरोकार समाज के हर वर्ग को बराबरी से उपलब्ध नहीं हो सके हैं, फिर भी इस विषमता की खाई को पाटने के लिए ग्रामीणों या सुरक्षाकर्मियों की लाशों नितांत ही ग़ल‍त और मूर्खतापूर्ण रास्ता है। वंचितों को हक़ दिलाने और सामाजिक समसरता स्थापित करने के अहिंसक तरीक़े भी हैं। आख़िर गाँधी इसी देश में हुए हैं और आज भी पूरे विश्व में प्रासंगिक हैं।

अब लगता है पानी सर से ऊपर जाने में देर नहीं है। सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर, निजी स्वार्थ से परे सोच रखकर दृढ़ इच्छाशक्ति से इस फांस को निकाल सकते हैं। लिट्टे का उदाहरण सामने है। समय रहते उपाय नही किए गए तो सालों बाद दिल्ली से ये बयान भी नहीं आ सकेंगे कि ये कायराना हरकत है, ये उनकी हताशा का परिणाम है, इसके लिए कठोर कदम उठाए जाएँगे, इसमें विदेशी तत्वों का हाथ है।

[प्रस्तुत आलेख दंतेवाड़ा में 6 अप्रैल 2010 को सुरक्षाकर्मियों पर घात लगाकर किए गए हमले के प्रतिक्रियास्वरूप है। इसमें दी गई जानकारी और विचार मेरी सामान्य समझ के अनुसार हैं। पाठक की इससे सह‍मति या असहमति हो सकती है या उनके अनुसार इसमें कमियाँ भी हो सकती हैं।]

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